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जिएं तो जिएं कैसे बिन आपके....फेसबुक

Posted On: 11 Aug, 2011 Others में

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जिएं तो जिएं कैसे बिन आपके, जिएं तो जिएं कैसे बिन आपके,

लगता नहीं दिल कहीं बिन आपके जिएं तो जिएं कैसे बिन आपके


एक समय था जब हम अपना टाइमपास करने के लिए वीडियो गेम या ट्र्म्प कार्ड (डब्ल्यूडब्लयू  खिलाड़ियों के) जैसे साधनों का इस्तेमाल करते थे या फिर मस्त मौसम में छत पर बैठकर कर घंटों ख्यालों के हवाईजहाज में सफर करते थे पर अब लगता है जमाना बदल गया है. हो सकता है शायद अब हम बड़े हो गए हैं इसलिए समय नहीं मिल पा रहा इनसब कामों के लिए. लेकिन अब एक नया शगल शुरु हो गया है टाइमपास करने का. यह टाइमपास ऐसा है जैसे शराब या ड्र्ग्स की लत.


online-social-networking-2जिंदगी की फ्रेंडसलिस्ट में चाहे कितने ही कम दोस्त क्यूं ना हो फेसबुक, ट्विटर, आर्कुट जैसी सोशल नेटवर्किग साइट्स पर फ्रेंड्स की लिस्ट हजारों में पहुंच जाती है. और यही दोस्त हमें अपने से लगने लगते हैं. दोस्तों की वॉल पर लिखना, उनकी फोटोज पर कमेंट करना और कमेंट का जवाब देना दैनिक दिनचर्या जैसा हो गया है.


बिना सोशलनेटवर्किंग के तो आज एक दिन भी गुजार पाना पहाड़ जैसा लगता है. कुछ समय पहले जहां लोग ऑरकुट से इतने प्रभावित हो गए थे कि साइट को बिमारी का नाम दे दिया गया था पर अब यह साइट पूरी तरह से टप्प ही गई है और इसकी वजह है फेसबुक. जब से फेसबुक आया है और हम जैसे भारतीयों ने इसके क्रेज को समझा है तब से तो कोई ऐसा दिन नहीं है जब इसके बिना दिन बीत जाए.


internet friendअब इसे अच्छी आदत कहें या बुरी जो अपने सामने या आसपड़ोस में रहने वाले दोस्तों की बजाय हमें इंटरनेट की मायावी दुनिया के दोस्तों की ज्यादा फ्रिक कराने की सीख देती है.


जब से फेसबुक जॉइन किया है तब से कई पूराने दोस्त मिले हैं. कई तो ऐसे हैं जो बचपन में उस समय के दोस्त थे जब हम स्कूल जाने के लिए रोया करते थे. पाचंवी-छठी में पढ़ने वाला अंकित, गोविंद बिष्ट और दसवीं बारहवीं के दीपक, मुकेश जैसे ना जानें कितने दोस्त-यार जो एक समय शायद खो से गए थे दूबारा दोस्त बन गए. लेकिन दोस्ती की जो गांठ कभी उस समय थी वह अब नादारद है. सरकारी ऑफिसों में पड़ी फाइलों की तरह दोस्ती पर भी समय के साथ शायद धूल जम गई.


अजीब सी है यह सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट की मायावी दूनिया जिसके सभी अवगुणों से हम अच्छी तरह अवगत हैं लेकिन फिर भी इसके पास जाते हैं जैसे आ बैल मुझे मार. लोग कुल्हाणी को पांव पर मारते हैं लेकिन इंटरनेट और यहां सोशल नेटवर्किंग को इस्तेमाल करने वाले जमीन पर पड़ी कुल्हाड़ी पर ही पैर मारने में विश्वास रखते हैं.


काफी दिनों से सोच रहा था इस विषय पर लिखने के लिए लेकिन समय की कमी की वजह से लिख नहीं पाया. उम्मीद करता हूं आपको इंटरनेट और ट्विटर-फेसबुक पर बिताए पलों की जरुर याद ताजा करवा दी होगी साथ ही कुछ पूराने समय की भी.




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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla Bhramar5 के द्वारा
August 12, 2011

मनोज जी अच्छा है दोस्त बनाना लेकिन दोस्त मित्र का अर्थ समझ वैसा व्यव्हार करना और भी अच्छा है काश उसमे से कुछ हमारे सच्चे मित्र बन जाएँ और केवल आनंद मजा ही न लें अभी एक शोध में पता चला नवयुवक अपना अधिक समय उसमे जाया कर बर्बाद हो रहे हैं – जिंदगी की फ्रेंडसलिस्ट में चाहे कितने ही कम दोस्त क्यूं ना हो फेसबुक, ट्विटर, आर्कुट जैसी सोशल नेटवर्किग साइट्स पर फ्रेंड्स की लिस्ट हजारों में पहुंच जाती है. और यही दोस्त हमें अपने से लगने लगते हैं. भ्रमर ५

    nikhil jha के द्वारा
    August 14, 2011

    शुक्ल जी, मैं आपकी और मनोज भाई की बात से बिलकुल सहमत हूँ. फेसबुक जीवन का एक हिस्सा बन गया है. विज्ञानं की इस अद्भुत दें ने सीमाओं को समाप्त कर दिया. मनोज भाई, तू ही तो मेरा दोस्त है…

    Rais के द्वारा
    August 16, 2011

    Face book ki wajah se aj asal dost bhi farzi lgne lage hain. har admi ye sochta hai ki ye samne wala pata nhn asli hai ya fake.


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