चिठ्ठाकारी

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Manoj


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समय से पहले ना छोड़े घोंसला

Posted On: 8 Jul, 2016  
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इन्हें जन्म देने से पहले सोचे ना!

Posted On: 7 Jul, 2016  
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कुछ रंग प्यार के ऐसे भी 1

Posted On: 14 Mar, 2016  
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देशभक्ति का कोई क्रैश कोर्स नहीं होता

Posted On: 1 Mar, 2016  
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जात ही पूछो आतंकवाद की

Posted On: 2 Aug, 2015  
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क्यों छोड़ देते हैं पंक्षी घोंसले – 1

Posted On: 15 Mar, 2015  
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ऑनलाइन बाजार में कहां टिकेगी हिन्दी

Posted On: 11 Mar, 2015  
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हर दिन जंग लड़ते “छोटू” सिपाही

Posted On: 30 Jan, 2015  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

नए नए लेखक और अधि अधूरी समझ बेटा अगर ऐसा गलत लिखोगे इस्लाम के बारें में तो ज़रूर कहीं मार खा जोगी और इस अखबार को भी बंद करवाओगे क्या तुम जानते हो इस्लाम में ओरतों का खतना नहीं होता और क्या तुम जानते है इस्लाम में क़ुरबानी क्यों दी जाती है और रही बात लडको की खतना की तो इसके बारें में भी पहले पढ़ो साइंस इसके बारे में क्या कहता है तुम में लिख दिया मासूम दर्द से बिलखता रहा और खून भी बहा लेकिन ये दर्द जब उसको जवानी में होता है न जब उसके गुप्तांग में इन्फेक्सन हो जाता है और बहुत से रोग है जिससे खतना बचाता है और सुनो दाई या डॉक्टर बच्चे का नाल ब्लेड से काटते है तब भी उसे दर्द होता है क्या वो नाल काटना बंद कर दे अगर ऐसा न करें तो वो सड़ कर उसे इन्फेक्ट कर सकता है उससे जो दर्द बनेगा उसे सोचो ज़रा ऐसी बहुत सी बातें है इसलिए कभी ऐसा ब्लॉग ना लिखा वो कहावत है न नीम हकीम खतरा ए जान ये ही आपकी हालत है अधि अधूरी नालेज है आपको इस्लाम की और ये जो आपका दोस्त कबीर है न ये आपके मन की उपज है न के कोई सच्चाई

के द्वारा:

के द्वारा:

हैलो सर ऐसा हो सकता है की प्रतिक्रिया कम हो या सब्दो मई गलतिय हो पर बात सटीक और बिलकुल सत्य है मुझे आप का आर्टिकल पसंद आया खास कर अंत में अपने ब्लॉग द्वारा मैं उन सभी तथाकथित बुद्धिजीवियों को एक संदेश देना चाहता हूं जो नक्सलवाद के साथ आतंकवाद को जोड़ते हैं कि नक्सलवाद एक पारिवारिक क्लेश के समान है और आतंकवाद पड़ोसी द्वारा घर में कुड़ा फेंकने जैसा. घर में अगर छोटे बेटे को प्यार ना मिले या उसे सभी सुविधाओं से विहिन रखा जाए तो वह विद्रोही हो सकता है लेकिन इस विद्रोह को घर में ही शांति से बात कर सुलझाया जा सकता है. उस बेटे को घर से निकाल देना उचित रास्ता नहीं. ये लाइन बेहद सही व उत्तम लिखी गयी है आभार स्वीकार करे

के द्वारा: yatindrapandey yatindrapandey

के द्वारा:

भाई मनोज जी खतने के बारे में आपकी आधी-अधूरी जानकारी और इस्लाम के बारे में आपकी गलतफहमियों को जानकर दुख हुआ। भाई मनोज जी सबसे पहले तो मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि इस्लाम महिलाओं के खतने की अनुमति नहीं देता। मुस्लिम महिलाओं का खतना नहीं होता। जहां तक लड़कों के खतने की बात है तो साइंस यह साबित कर चुका है कि स्वास्थ्य के नजरिए से देखा जाए तो खतने के बेहद फायदे हैं। इससे इसकी सिर्फ साफ-सफाई ही नहीं होती बल्कि एड्स, कैंसर सहित कई बीमारियों से खतना बचाता है। द अमरीकन एकेडेमी ऑफ पीडीऐट्रिक्स ने अपने ताजा बयान में कहा है कि नवजात बच्चों में किए जाने वाले खतना या सुन्नत के सेहत के लिहाज से बड़े फायदे हैं। इनमें खासतौर पर छोटे बच्चों के यूरिनरी ट्रैक्ट में होने वाले इंफेक्शन, पुरुषों के गुप्तांग संबंधी कैंसर, यौन संबंधों के कारण होने वाली बीमारियां, एचआईवी और सर्वाइकल कैंसर का कारक ह्युमन पैपिलोमा वायरस यानि एचपीवी शामिल हंै। एकेडेमी उन अभिभावकों का समर्थन करता है जो अपने बच्चे का खतना करवाते हैं। रही मासूमों में दर्द की बात तो यह थोड़ा सा दर्द बच्चे को भविष्य में कई बड़े दर्दों से बचाता है। ऑपरेशन करते वक्त मरीजों को कई तरह की परेशानियां होती है, इसके मायने यह नहीं कि डॉक्टर मरीजों को दुख पहुंचाना चाहता है, डॉक्टर तो उसे बड़ी परेशानी से बचाना चाहता है, इस वजह से उस ो थोड़ी बहुत तकलीफ देता है। यही मामला खतने का है। आप मेरी वेबसाइट पर आइए खतने पर आपको अच्छा लेख पढऩे को मिलेगा। आपका यह कहना कि खतने का जिक्र कुरआन में नहीं है, मैं यह बताना चाहूंगा कि इस्लाम का मतलब है कुरआन और पैगम्बर मुहम्मद साहब की शिक्षा और अमल। खतना मुहम्मद साहब की शिक्षा और अमल का नाम है। भाई मनोज जी, दुख हुआ कि आपने इस्लाम को बिना जाने, समझे, पढे, इंसानियत का दुश्मन करार दे दिया। मुझे कोई कह दे कि मनोज जी चोर, बदमाश और कू्र है तो मैं इस बात पर तब तक यकीन नहीं करूंगा जब तक मैं आपसे रूबरू ना होऊं, आपसे मिल-बैैठकर आपको समझ ना लूं, तब ही मैं आपके बारे में कोई राय बना पाऊंगा। भाई मनोज जी मेरी आपसे गुजारिश है आप इस्लाम को अच्छी तरह समझे। कु रआन और मुहम्मद साहब की जीवनी बिना किसी पूर्वाग्रह के पढें। अपने दिल और दिमाग से इन पर विचार करें। फिर आप इस्लाम के बारे में अपनी राय बनाएं। भाई मनोज जी मुझे आपके दिल और दिमाग पर पूरा यकीन है कि अब जो आपकी राय बनेगी सही और उचित बनेगी।  

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के द्वारा: महत्वपूर्ण दिवस महत्वपूर्ण दिवस

आप शायद सच कह रहे हैं कि बहुतों को लोकपाल बिल के बारे में नहीं पता....लेकिन युवा सड़क पर उतरने तब शुरू हुए जब तानाशाही तरीके से अन्ना हजारे को शांतिपूर्ण अनशन करने से रोका गया,यह कितनी घोर शर्म की बात है कि देश कि पहली महिला आई पी एस किरण बेदी को भी अकारण हिरासत में लिया गया...लोगों ने मौलिक अधिकारों का यह दमन बर्दाश्त नही किया और लोग सड़कों पे उतर गए....सरकार लोकपाल बनाये,ना बनाये...यह प्रश्न बाद में आता है...लेकिन आप किसी से भी शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात कहने और अहिंसात्मक रूप से विरोध करने का अधिकार नही छीन सकते. मैं एक बात और आपसे कहना चाहूँगा...लोगों को अन्ना हजारे या 'उनके' लोकपाल बिल का समर्थन नही बल्कि इमरजेंसी की आशंका ने सड़कों पे उतरने को मजबूर किया,जो त्वरित बेतुकी कार्यवाहियों से सरकार ने जाहिर करने की कोशिश की थी.हम लोकतांत्रिक देश में हैं,तानाशाही यहाँ नही चलेगी,यह सरकार को समझ में आ जाये,आज इसी वजह से सभी लोग एक मंच पर जुटे हैं.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

मानवाधिकार कार्यकर्ता जेलों में बंद उन क़ैदियों के मानवाधिकारों की बात करते हैं जो या तो सजा भुगत रहे होते हैं या फिर जो बिना सजा के ही जेल में ठूस दिए जाते हैं. भारत में ऐसे कई राज्य जहां सिर्फ पूछताछ के नाम पर आरोपी को तीन चार दिन या कभी कभी अनिश्चितकाल तक पुलिस कस्टडी में रख थर्ड डिग्री दी जाती है. जबकि मुक़दमे की सुनवाई या फ़ैसला होने से पहले किसी को दोषी मान कर उसके साथ दुर्व्यवहार या तथाकथित थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट निश्चित तौर पर मानवाधिकारों का हनन है. आपकी पोस्ट में वो सच्चाई है जो हम 'बंदीयों' के बीच रहकर जानते है की क्या एक ८५ साल की बुढ़िया जो सही तरीके से सून-बोल भी नहीं सकती ना तो चल सकती है उसने अपनी बहू को जला सकती होगी भला? ऐसे ही कई प्रश्न मन में उठते हैं पर तब लगता है हमारा कानून ऐसा क्यों ? कम से कम मानवअधिकार वालों की नजर में ये सब कुछ क्यों नहीं आता? बड़ा दर्द होता है ये सब देखकर|

के द्वारा: razia mirza listenme razia mirza listenme

के द्वारा: Manoj Manoj

हमारे यहाँ किसी महापुरुष पर लिखना खतरे से खाली नहीं ,लेकिन कुछ कमिया जो मानवीय भी हो सकती है उन्हें भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है जैसे महानता की बात या अंहिसा के मसीहा की पदवी पर बैठने की बात तो हम भावनाओ से उपर उठ कर सोचने की आवश्यकता है जैसे गाँधी जी अतिमाहत्वकंची थे वे भगत सिंह की लोकप्रियता से इतना घबडाते थे कि उन्होंने भगत सिंह की फाँसी रुकवाने में जानबूझ कर जनता में भ्रम फैलाया और इसकी संभावना होने के बाद भी समझौते से उफ्रावाडियो और अनुशासन हीनता के अरोपियो (चन्द्र सिंह गढ़वाली जिसने निहाथ्थी जनता पर गोली चलने से इंकार कर दिया था.)को सफाई से अलग कर दिया अब यह ब्रिटिश दस्तावेजो से जाहिर हो चूका है कि भगत सिंह की फाँसी के बारे में समझौते के समय कोई बात नहीं रखी तत्कालीन वैसराय के रोजनामचे से स्पष्ट है कि समझौता वार्ता ख़तम होने के बाद गाँधी ने उनसे पूछा कि अगेर मै बहार लोगो को बताऊ कि मैंने आपसे भगत सिंह के बारे में चर्चा की तो आपको कोई आपत्ति तो नहीं होगी .जब कि कांग्रेस के अधिवेशन में बहुत मुश्किल से १४०० के लगभग सदस्यों वाली कार्यसमित में पूरा जोर लगाने के बाद भी मात्र ३१ के बहुमत से भगत सिंह के खिलाफ निंदा का प्रस्ताव पारित करा पाए थे. यहाँ गाँधी का अहिंसा वाला तर्क इस बात से ख़ारिज होता है कि साम्राज्यवादियो के दुसरे विश्व्युध्ध में एक गाव बीस जवान का नारा दे कर साम्राज्यवादियो के युध्ध का समर्थ्जन करते नजर आये इसी तरह सुभाष चन्द्र बोसे के लोकतान्त्रिक तरीके से अध्यछ चुने जाने के बाद भी सीता राम्मैया की हार मेरी हार है कह कर उन्हें भी पद और दल चोदने को बाध्य किया १४ राज्यों में १२ के अध्यचो के समर्थन को दरकिनार कर तिलक की जगह नेहरू के प्रधान मंत्री बनाने का मार्ग प्रशस्त किया और यही आज की avyvstha के mul में है tajjub होता है कि जो cheej Bhagat Singh 1930 में dekh rahe थे कि ajadi के बाद bhure angrejo से और badi ladai ladani होगी use yato Gandhi dekh नहीं pa rahe थे या Bidla के vahano और anudano per swatantrata की ladai lad rahe थे, NATHU RAM GODSE NE BHI ADALAT ME YAHI SWIKAR KIYA THA KI MAINE GANDHI KA BADH KIYA HAI. abhi wakt इस per apna faisala dega.

के द्वारा: shuklaom shuklaom

प्रिय मनोज जी लेख की बधाई लोग जानते नहीं या समझते नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन मै समझाता हु की बापू ने शिफ़ भारत को ही आजादी नहीं दिलाई थी बल्कि पाकिस्तान को भी आजाद कराया था अपवाद तो सभी जगह होते है हो सकता है की १% लोग भारत मै बापू को दोसी मानते हो लेकिन पाकिस्तान में तो आप समझ सकते है बापू का कोई स्थान नहीं है आप को जानकर आश्चर्य होगा मेरे एक मित्र सउदी अरब आए थे उनकी बापू के प्रति क्या श्रधा थी वो राज घाट पर मेरे साथ गए और बापू की समाधी पर अपना माथा टेका और कहा सउदी मै लोग या तो अलाह को माथा टेकते है याफिर गाँधी जी को . उनकी श्रधा देखकर मैंने प्रश्न किया आपकी और आपके देश के लोगो की गाँधी जी मै इंतनी श्रधा क्यों है बापू का तो सउदी से कभी कोई रिश्ता रहा नहीं उनका जबाब था ये बापू मानवता का फरिस्ता था एक पैगम्बर से कम नहीं था आप लोग भाग्य शाली हो जो बापू जैसा पैगम्बर आपके यहाँ पैदा हुआ मैंने दूसरा प्रश्न किया बापू ने तो भारत और पाकिस्तान दोनों को की आजाद कराया था लेकिन पाकिस्तान मै तो बापू का कोई स्थान नहीं है आप तो दुसरे देश के हो कर भी आप की बापू मै श्रद्या है उस अरबी मित्र का जबाब था की ये अह्शन फरामोशी है पाकिस्तान की उसका नतीजा दुनिया देखा रही है की आज पाकिस्तान का नाम ख़तम होने के कगार पर है मेरे उस सउदी मित्र ने मेरे साथ बापू की समाधी पर कुछा फोटो भी खिचवाई यहाँ पर फोटो खीचना मना है परन्तु सरकारी स्वीकृति से यह संभव हुआ बापू का नाम यदि टाइम पत्रिका मै एक नंबर पर आया तो आश्चर्य की बात नहीं बापू तो है ही महान बापू जी के साथ साथ कवी प्रदीप को भी मेरी स्राधांजलि देदी हमें आजादी बिना खड़क बिना ढाल सवारमती के संत तुने कर दिया कमाल

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के द्वारा: Manoj Manoj

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के द्वारा: Manoj Manoj

भाई मनोज जी, सादर नमस्कार, मैं आपके सुंदर लेख के लिए आपको बधाई देना चाहता हूँ ! साथ ही आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, इस बात के लिए की जब मैंने JAGRANJUNCTION पर लिखना शुरू किया, तो मेरी तीसरी रचना सानिया मिर्ज़ा की शादी पर पहली प्रतिक्रिया आई, शायद आप अंदाजा नहीं लगा सकते की उस प्रतिक्रिया ने मेरे अन्दर कितना उत्साह, उर्जा और विश्वास भर दिया की आज मैं BLOG STAR CONTEST के अंतिम १० मैं शामिल हूँ ! आपको शायद नहीं मालूम वो पहली प्रेरणास्पद प्रतिक्रिया आप ही की थी, उसके बाद आपने मेरे लेखों पर प्रतिक्रियाएं देना बंद कर दिया! मगर आपकी उस पहली प्रतिक्रिया मैं जिन्दगी भर नहीं भूल सकता ! आपकी वेह बहुमूल्य प्रतिक्रिया स्मरण हेतु आपको प्रेषित कर रहा हूँ ! आपका भाई ALLROUNDER "क्या बात कही आपने . सच में यदि सानिया युसुफ या इरफान के साथ निकाह करती तो ज्यादा खुशी होती, लेकिन शायद इसे ही दिल की मजबुरी कहते है जो पाकिस्तान में उनका दिल लग गया, खेर अभी भी कुछ भी हो सकता है , भुलिए नही कि पहले भी सानिया एक बार सगाई तोड चुकी है और इतिहास खुद को दोहरा सकता हैं."

के द्वारा: allrounder allrounder

भाई साहब पहले तो आपको धन्यवाद् इस और ध्यान आकर्षित करने के लिए. पर उससे भी पहले कियों नहीं इन सबसे बड़े जानवरों को ( हमारे पालतू पाले हुए जानवर --- हमारे नेतागण / हमरे मिनिस्टर\'स ) को न सिर्फ राज्य से नेकाल करके बहार खदेड़ दे. पर हो सके तो इन हरमखोर जानवरों (मिनिस्टरो) को नंगा करके दुनिया से ही विदा कर दे. कियों की अगर राज्य से निकल देंगे तो सब ठीक हो जायेगा कियो की ये (जानवर - मिनिस्टर्स) इतने बदतमीज़ और नमक हरम हो चुके है की खामखा दुसरे राज्यों को ख़राब कर देंगे, और मौका पाकर देश को भी. आप को बता दे, जब हजारो आवारा जानवर (कुते / सूअर) वगेरेह मरे होंगे तब जाकर आज लालू / शरद / शीला / राज जैसा कोई एक मिनिस्टर पैदा होता है.... सबसे पहले इस गन्दगी को हम सब (आम इन्सान) मिलकर इन को साफ करे तो न सिर्फ इस देश का बल की मानव जाती का भला हो जायेगा.. जागो आम हिन्दुस्तानियों जागो ! ! !

के द्वारा:

मनोज जी आपकी भावनाओ की सराहना करना चाहूँगा की किस तरह से आपने आवारा जानवरों से बच्चो की भावनाओ को जोड़ दिया,आपने उपाय भी अच्छे बताये है, ये वो उपाय है जो बहुत पहले इस्तेमाल में आने चाहिए थे लेकिन अब ये आवारा जानवर हमारे समाज का अभिन्न अंग बन गए है! आपकी भावनाओ से सहमती जताने वाले लाखो में होंगे क्योंकि हमें आदत पड़ चुकी है इस बदबूदार वातावरण में रहने की, इसे सहने की, आज नकारात्मकता हम पर इतनी हावी हो चुकी है की हमें इससे प्यार हो गया है! असली दूध,घी हमें हजम नहीं होगा,शुद्ध ताज़े मसाले की खुशबु से हमारा जायका ख़राब हो जाएगा,शुद्ध ताज़ी सब्जियां और दाल खाकर शायद हमें उलटी हो जाए,दिल्ली की सडको पर चलते हुए अगर धूल और धुंए का एहसास न हो तो दिन भर चक्कर आते रहेंगे ये कुछ ऐसी बाते है जो हमें सूअर की याद दिलाती है जिसे अगर प्यार से किसी साफ जगह पर रख दो तो वो नाराज होकर फिर कीचड़ में ही सुकून तलाश करेगा!

के द्वारा: subodhkantmisra subodhkantmisra

सर, एक बात इमानदारी से बताइए क्या आपको इन आवारा जानवरों से कोई परशानी नहीं होती ???कभी आपकी बाइक के सामने कोई कुत्ता नहीं आया और तब आपको गुस्सा नहीं आया की अगर ब्रेक सही टाइम पर नहीं लगते तो ये मर जाता ! और तब आपके लिए ये एक मुसीबत हो जाती ! हमें इनसे प्यार है, ये हमारी जिंदगी का हिस्सा है........etc. etc. etc. ये सब कहना तब तक ही अच्छा लगता है जब तक ये हमें नुक्सान न पहुचाये ! अब इसका मतलब ये नहीं की मैं इनके खिलाफ हूँ ! मेरे घर मैं मैंने खुद अब तक तोता, खरगोश, और कुत्ते पाले है ! और इनसे मुझे बहुत प्यार रहा है लेकिन अगर मुझे गली में कोई भी आवारा कुत्ता दिख जाये तो डर जाती हूँ ! क्योकि ये पूरी तरह से unpredictable होते है ये कब आपको नुक्सान पंहुचा दे या कब अपनी frustration आप पर निकाल दे आप कह नहीं सकते हालाँकि मेरे साथ ऐसा कभी हुआ तो नहीं है पर जिस तरह से इन आवारा घूमते जानवरों की लोगो पर हमले करने की खबर पड़ती हूँ तो इनसे डर लगता है ! आपने कुत्तो और गायो का उद्हरण दिया लेकिन बंदरो के बारे में क्या कहेंगे ???? जिनको पिछले साल खुद दिल्ली के लोग ही दिल्ली से चलता करना चाह रहे थे ! किसी भी चीज़ की अति हमेशा ही बुरी होती है ! अभी मेरे पड़ोस में एक लड़का उड़ीसा से दिल्ली देखने आया हुआ है जब मैंने उससे पूछा की दिल्ली कैसी लगी उसने एक लाइन में कहा दिल्ली अच्छी नहीं है ! मैंने पूछा क्यों भई ऐसा क्यों तब उसने कहा की यहाँ भीड़ बहुत है, लोग बहुत ज्यादा है, और सडको पर गाड़िया भी बहुत ज्यादा है ! अब आप क्या कहेंगे ??? यहाँ भी मामला अति का ही है आप भी ट्रेफिक जाम में फसते होंगे ! तब आपको भी बहुत गुस्सा आता होगा ! खैर ये चर्चा के लिए अलग ही विषय है इस पर चर्चा फिर कभी ............ अभी फिर से लौटते है आपके विषय पर ..........जब आप रात को सोने की कोशिश करे और तब जो इन कुत्तो का मुशायरा शुरू होता है वो क्या आपको परेशान नहीं करता ???? दिल्ली sarkaar जिस तरह से इन jaanvaro को pakad कर bahar कर rahi है तो अगर आपको yaad हो तो बंदरो के mamle में anya rajyo ne inhe lene से mana कर दिया tha ! aabhi parso ही एक bandar metro train के andar ghus gaya jise nikalen के लिए sabhi को kadi mehnat karni padi और tym barbaad हुआ वो अलग और kaun kehta है की इन jaanvaro को samajh से anupasthit कर do ..........yahi एक solution नहीं है sarkaar इन आवारा gaayo के लिए gaushalaye bana sakti है kuuto के लिए अलग sthan bana sakti है और kai jagah पर sarkaar ne ये kiya ही है आप Najafgarh chle jaiye waha आपको एक भी gaaye avar ghumti नहीं milegi sabhi gaushaala में rehti है ! Tuglakabaad में bandro के लिए अलग से rehne की vyvastha की gai है ! अगर sarkaar सही तरह से kaam करे और लोग apna सही yogdaan दे तो किसी को भी pareshaani नहीं hogi ..........

के द्वारा:

मैं यह सभी से एक बात पूछता हु प्यार को हम किस नज़र से देखते है प्यार मैं सेक्स की बात पर रोजाना कोई न कोई समजदार समाज का टेकेदार हो हल्ला करते है भाई प्यार मैं सेक्स कोई बुराई नहीं है प्यार होगा तो सेक्स होगा और सेक्स होने पर प्यार और जयादा मजबूत होगा. और जब दो लोगो को परेशानी नहीं है तो हम क्यों हाय हाय करते है रही बात संस्कृति की तो आज का युवा जिस मजबूती से अपनी संस्कृति को पकडे हुए है किसी और देश का युवा वेसा कर भी नहीं सकता .... आज का युवा अपने धार्मिक आयोजनों को भी एक अलग तरीके से मनाता है जिसे बड़े बुजुर्ग सब साथ एन्जॉय करते है.. बॉम्बे का डंडिया,,, मटकी तोडना ये सब आज युवाओ की ही दें है जिसे उन्होंने एक नए अंदाज मैं बदल दिया है.. आज का युवा आज हर त्यौहार को एन्जॉय करता है तो लोगो की ये सोच की युवा अपनी संस्कृति को भूल चुका है गलत है... और हम युवा बदलने वाले नहीं है

के द्वारा:

समाज के बदसूरत पहलु को आइना दिखाने के लिए साधुवाद आप ने एक जगह कहा है की शाम होते ही ये सड़क पर रहने वाले बच्चे नशे मैं डूब जाते हैं - जानते हैं क्यों, क्योंकि वहां ड्यूटी दे रहे सिपाहियों, उम्र मैं बड़े भिखारिओं के साथ उन्हें रात गुजारनी होंती है और वह तभी संभव है जब ये मासूम बच्चे नशे मैं धुत होंगे. रचनाजी आप को भी अपनी बात का उत्तर शायद इसमैं मिल गया हो की रात मैं ये औरतें और लडकिया अपनी सुरक्षा कैसे करती हैं वास्तव मैं इन सड़कों पर रहने वाला हर शख्स हर दिन एक मौत मरता है.... सरकार से उम्मीद करने की बजाये अगर हम आप इन बच्चों के आस पास चल रहे वैकल्पिक स्कूल और शेल्टर होम्स का पता लगा कर इनमे से एक दो को भी उधर पंहुचा दें तो शायद अपने हिस्से की कुछ जिम्मेदारी निभा सकेंगे.........

के द्वारा:

अभी अभी दोबार जल्दी जल्दी दिल्ली जाना हुआ तब टैक्सी वाले से मैंने अपनी आदत के अनुसार उसके बोलने के अंदाज से बता दिया कि उत्तर प्रदेश के खड़ी बोली वाले स्थान से है ऐसा करने से अक्सर टैक्सी वाले मित्रवत हो जाते हैं तथा संमय अच्छा तो कट ही जाताहै saath ही टैक्सी वाले tension free टैक्सी चलाते है व कुछ महत्वपूर्ण सुचना शहर के हालात पर देने लगते हैं | वह भी बताने लगा कि कामन वैल्थ से पहले कितना काम चल रहा हर जगह निर्माण ही निर्माण | होटलों को अधिक लोगों के लिए सुसज्जित करना etc etc मैं भी सरकार कि तारीफ़ करने लग रहा था पर तभी उसने एक ऐसा तथ्य बताया कि मैं स्तब्ध रह गया yahan के भिखारिओं को जबरदस्ती उत्तरप्रदेश bihar क़ी taraf jaane wali train मैं pack karke dur dur bheja ja रहा है taki koi videshi unhe na dekhane paaye Yah sach सरकार के sabhi sarthak pryason पर bhari pada ,मैं phir alochak हो गया aakhir मैं manoj ji aap kafi samvedan sheel हैं agli post ka intjar

के द्वारा:

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आपका लेख एक बेहतरीन प्रयास है | उम्मीद करता हूँ की देश की जनता की आँखें इस ओर खुल जाएँ | कोशिश करें , कि कोई ठोस कदम स्वयं इस दिशा में उठाकर एक सशक्त उदहारण प्रस्तुत करें | जहाँ तक इन बच्चों को काम दिलाने की बात है तो सरकार ने ही बाल श्रम वर्जित किया है , साथ ही प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य भी | देखने वाली बात ये होगी की इस 'आबादी' को चिन्हित कैसे किया जाए | आशा है 'यूनीक आइडेन्टिटी' प्रोग्राम इस दिशा में सफल साबित हो | फिर जिस देश में जनसँख्या पर लगाम नहीं होगी और गरीबी लाइलाज , वहां ऐसी दिक्कते कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन सकती | अगर नकेल डालने की हिम्मत सरकार दिखाती है तो समाधान संभव हो सकता है | धन्यवाद |

के द्वारा:

मनोज जी आपकी ये पोस्ट वास्तव में मन को छु लेने वाली है ... आपने बहुत संवेदनशील तरीके से इस समस्या को उठाया है ..जहा तक मेरा मानना है ऐसी कोई भी समस्या नहीं hoti है किसी भी लोकतान्त्रिक समाज में जिसका समाधान करना सरकार के बस में न हो... लेकिन दुखद रूप से हमारी सरकारों ने बहुत से मूलभूत मुद्दों पर जिसतरह का गैरजिम्मेदाराना और नकारात्मक रवैया अपनाया है जिसका परिणाम है ये सामाजिक दुर्भाग्य स्ट्रीट चाईल्ड .... इसके लिए हम भी जिम्मेदार है क्योकि हम शांत प्रकृति के लोग परेशानी को देखते है ,, कुछ उसका फ़ायदा उठाते है कुछ गली देते है और सरकार को कोसते है और आगे बढ़ जाते है.......... मगर समाधान के लिए कुछ प्रयास होने चाहिए इस पर सोचने की जरुरत है ... इसपर और चर्चा होगी.... अच्छी पोस्ट है आँखे खोलने वाली ...........

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

न्यूक्लियर डील के पीछे एक बहुत बड़ी डील की गयी है । इसकी रकम इतनी बड़ी है कि कांग्रेस ने यूपीए सरकार तक को दांव पर लगा दिया था और चिरंजीवी अमर सिंह अपना हिस्सा लेने न्यूयार्क तक चले गये थे फिर उसके बाद सपा ने यूपीए को समर्थन दिया था । ऊर्जा और बिजली तो मात्र सिर्फ एक छोटा सा बहाना है । क्योंकि जिनती बिजली इन परमाणु रियेक्टरों से मिलनी है उससे पांच गुना ज्यादा बिजली तो सिर्फ हिमालय से निकलने वाली नदियों पर छोटे छोटे बांध बना कर बनाई जा सकती है । और रही रियेक्टर बनाने की तकनीकी की बात तो पिछले साल बनी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी अरिंहत में स्वदेशी परमाणु रियेक्टर लगाया गया है । दिशा निर्देश सिर्फ रूसी थे । तकनीकी पूर्णतः स्वदेशी । अब रही बात यूरेरियम की तो राजस्थान और मेघालय में प्राप्त नयी खदानों से हम लाखों टन यूरेनियम प्राप्त कर सकते हैं । तब यह डील किस लिये की गयी ? सिर्फ बहुत सारे पैसे के लिये । एक इतनी बड़ी रकम जो किसी भी भारतीय कम्पनी के वार्षिक लाभ से भी कई गुनी ज्यादा है ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

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के द्वारा: Ashish Ashish

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के द्वारा: darshanbaweja darshanbaweja

बन्धु, व्यंग का उचित मात्रा में सटीक प्रयोग करके, "मीडिया" की अनुचित कार्यशैली को आइना दिखाने की आपकी कोशिश प्रशंसनीय है | पहले मीडिया की सक्रियता को लेकर जनता प्रश्नवाचक की मुद्रा में रहती थी (पता नहीं कोई आएगा भी या नहीं) परन्तु अब मीडिया की अति सक्रियता को लेकर सहमी हुई स्थिति में रहती है (पता नहीं कब-कौन आ जाये और क्या करते हुए फोटो-वोटो खींच ले) | अति किसी भी चीज की बुरी ही होती है और अब इस ई-मीडिया ने तो अति की भी अति कर दी है | जहाँ कई फायदे हुए हैं वही नुकसानों का भी लेखा-जोखा काफी लम्बा है | और इस विश्वसनीय संस्था पर संदेह की दृष्टि निरंतर बनी हुई है | आशा है की परिवर्तन चक्र एक बार फिर घुमे और परिस्थितियों में सुधार हो | आप इसी प्रकार अपना लेखन जारी रखें | धन्यवाद |

के द्वारा: ASHISH RAJVANSHI ASHISH RAJVANSHI

मनोज जी सारी बाते विस्तार से और बेहद व्यवस्थित तरीके से अपने बता ही दी है......अब हम बाजारवाद के गुलाम हो चुके है ...अब हमारी भूख बढती जा रही है..... मीडिया अब मनोरंजन और ज्ञान का साधन नहीं रहा ..वह हमारे मानसिक आर्थिक और सामाजिक शोषण का जरिया बन चूका है ,अंग्रेजो ने भारतीय जनता के शोषण के लिए देसी रियासतों के अवसरवादी शासको को जरिया बनाकर शोषण किया था....आज की विदेशी बहुरास्ट्रीय कंपनिया मीडिया के माध्यम से वह काम कर रही है......विकास के नाम पर हमारे कपडे फिर उतारे जा रहे है..... अंग्रेजो के समय हमने मजबूर होकर ये काम किया था अब हम ख़ुशी ख़ुशी आधुनिक दिखने के लिए ये काम कर रहे है...मीडिया पर कठोर नियंत्रण समय की मांग है...सही कहा आपने आज न्यू chainal भी खोल कर बैठने में डर लगता है क्या पता कब क्या दिखा दे और हम बच्चो से निगाह चुराकर चैनल बदले और बच्चे हमसे निगाह चुराकर चुप हो जाये..... एकता जी ऐसा बीज बोदिया है की लगता है किसी भी चैनल को खोलो उसकी नारी पात्र या तो शाजिश रचती दिखेगी या फिर रोती हुई ..... मै स्वयं इतना परेशान हो गया इस रोने धोने से की मैंने स्टार प्लस चैनल ही लाक कर दिया ... आपकी एक बात से मै १०० % सहमत हु की असली मजा सब के साथ ही है.. और यही एक चैनल है जिसे हम सभी देखते है और भरपूर मजा लेते है................और मन ही मन सोचते है की.. इससे सुखी हम तब थे जब केवल दूरदर्शन और मेट्रो चैनल थे......

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: Manoj Manoj

श्रीमान मनोज जी, मुद्दे को आपने सही तरह से उठाया है किन्तु यह मसला बेहद संवेदनशील है और इसे इसके व्यापक परिप्रेक्ष्य में समाजार्थिक पहलुओं को ध्यान में रख कर देखना होगा. नई आर्थिक व्यवस्था में जहा भौतिक प्रगति और चमक-दमक वाली जीवन शैली को प्रधानता मिल रही है वहाँ पर कामनाओं और आनातारिक अभिवृत्तियों पर लगाम लगा पाना अधिकाँश लोगों के लिए नामुमकिन होता है. आम जन शीघ्र ही इस चक्रव्यूह में फंस कर सपनीली दुनिया की सैर करने लगते हैं. इसी बात का फायदा तथाकथित पहुंचे हुए लोग उठाते हैं. समय ने काफी कुछ बदल कर रख दिया है. पहले स्त्रियाँ अपनी इज्जत और मर्यादा के लिए सतर्क रहती थीं किन्तु अब बहुत सी औरतों के लिए भोग वादी जीवन ही प्रधान हो चुकी है. अक्सर वे खुशी -खुशी गर्त में जाना मंजूर करती हैं क्योंकि उनकी अतृप्त लालसाओं की पूर्ति का सबसे आसान माध्यम शरीर द्वारा धनार्जन हो गया है. आधुनिक व्यवस्था ने व्यभिचार के लिए गोल्डेन अवसर प्रदान कर दिया है. एक भ्रम का वातावरण सर्वत्र व्याप्त है. ऐसे में आवश्यकता है समाज के कुछ पथप्रदर्शकों की जो सब कुछ न्योछावर कर उचित मार्गदर्शन में सहभागी बन सकें.

के द्वारा:

के द्वारा:

अमर सिंह का राजनीतिक व्यक्तित्व काफी विवादास्पद रहा है |कभी कांग्रेस और सोनिया की मुखर आलोचना करने वाले अमर सिंह आज उनके प्रति काफी नरम दिखाई दे रहे हैं |मुलायम के संकटमोचक ने आज मुलायम ही को दुविधा में डाल दिया है |अमरवाणी की तरह ही उनका राजनीतिक चरित्र भी कई रंगों वाला है |फिल्म जगत और ऊँचे औद्योगिक घरानों में अपनी दखल के कारण कुशल राजनीतिक प्रबंधक कहे जाने वाले अमर सिंह ने अपने इसी हुनर का प्रयोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पाने के लिए किया|उनकी राजनीति का केंद्र-बिंदु ही सत्ता की चमक-धमक है |शायद वे अब मुलायम परिवार में अपने छोटे-भाई के किरदार से मुक्त होना चाहते हों |वैसे रहस्मय अमर-कथा अभी जारी है और समय-समय पर वे खुद ही इसका धमाकेदार अंदाज में मंचन करते रहेंगे क्योंकि अखबारों की सुर्ख़ियों से वे गायब नहीं हो सकते |

के द्वारा:

भारतीय राजनीित का स्तर िकतना िगर चुका है। इसका पऱत्यक्ष पऱमाण हैं अमर िसंह । कभी खुद को व मुलायम िसंह को सीबीआई की िगरफ्त में जाने से बचाने के िलए िबना मांगे समाजवादी पाटी का समथर्न देकर यूपूीए सरकारको बचाया। तो कभी भाजपा को सत्ता से दूर रखने व बसपा के शासन को समाप्त कर यूपीए में राष्टपित शासन की मांग को लेकर िबन बुलाए मेहमान बनकर सोिनया गांधी व मनमोहन िसंह के पास पहुंच कर अमर िसंह अपना भाव िदखाते रहते हैं। िक सत्ता के नजदीक रहने के िलए कुछ भी करेंगे। चाहे बेशमर् ही क्यों न बनना पड़े। ना अमर िसंह सपा को यूपीए का समथर्न करके सरकार बचाती और ना ही देश में इतनी महंगाई की बाढ़ आती। अमर िसंह तो कई महीनों से मीिडया की सुिखर्यों से गायब थे। इसीिलए इस्तीफे का ड्रामा िकया है।

के द्वारा:




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